अधूरी ख्वाहिश:जीने की चाह

वो ख्वाहिश ही क्या, 
जो आसानी से मिल जाए। 
जिद तो उसे पाने की है, 
जो हाथों की लकीरों में नहीं। 

मुद्दतों बाद मिली थी खुशी, 
वो भी अधूरी रह गई। 
मिल के भी एक नहीं हो सकते, 
बस इतनी सी मजबूरी रह गई। 

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